ज़िन्दगी ख़त्म
ज़िन्दगी जैसी कुत्ती चीज़ कोई नहीं। अगर थोड़ा सा मैं भी रूठ जाऊं तो ज़िन्दगी भी साथ छोड़ देती है, एक ही पल में कह देती है मज़बूरी में जी रहा है तू, जा आखिरी सांसे भी ले ले। बोझ बनने से बेहतर मुझे यही लगता है। रो लेना ज्यादा बेहतर है पर प्यार की भिखना मांगना इस दुनिआ में पाप है। मैंने ये पाप रोज किया है। किसी एक लिए मैंने खुद को रोज दर्द दिया है, हाथ चीर के उसका नाम लिखा है। हाथ की नशों का खून बहा दिया है उस एक शख्स के लिए जिसने ज़िन्दगी से नफरत करना सिखा दिया। क्या पता था इतना प्यार हो जायेगा, जो किस्मत में कभी हो ही नहीं सकता उसके लिए इतना परेशान ही क्यों होना। ये दिल भी बड़ी अजीब चीज़ होती है, इसके आगे चाहे लाख कोई अपना प्यार लेके आ जाये पर इसे वही एक शख्स चाहिए जिसे वो अपना सब कुछ मान चूका है। फिर चाहे उस शख्स के आगे आप अपनी जान भी दे दो पर उसे रत्ती भर फर्क न पड़े। जो नहीं होना था वही हो गया, लाख दिमाग के कहने के बाद भी ये दिल नहीं माना। आखिर वही किया जिससे लाख मन्नतें मानने के बाद प्यार वापस मिला और हमेशा के लिए दूर हो गया। ज़िन्दगी भी क्या खेल खेलती है जो नहीं...