मर जाओ फिर सब खुश

    ज़िन्दगी ऐसे-ऐसे मोड़ लेती है जिसमे इंसान अगर थोड़ा खुश हो तो उस ज़िन्दगी के लिए ये सबसे बड़ी दुविधा की बात है। आखिरी कोई एक पल के लिए भी खुश हो कैसे सकता है। वक़्त पलटने में ज़रा सा भी समय नहीं लगता की वक़्त भी थोड़ा ठहर जाये और दो पल तो कोई खुश हो ले उससे। 
    
    सोचा नहीं था जो वो होता रहा, सँभालने की कितनी ही कोशिशे करते रहा मैं पर उस भगवान को कहाँ मंजूर की इस इंसान को मुस्कुराते कैसे देख सकता हूँ। कभी-कभी लगता है जैसे वो ऊपर से देख के हँसता रहता है मुझे की हाँ आखिर यही वो शख्स है जिसे रोते हुए देखने में भगवान को बोहोत सुकून मिलता है।  मैंने जितना माना जितना भरोशा किया उतना ही उसने मुझे अंदर से तोडा है। कितनी ही श्रद्धा से मैंने महाशिवरात्रि का निर्जला व्रत रखा था पर क्या पता था मैं अपने ही जीवन में अँधेरा लाने के लिए पूजा कर रहा हूँ। जब सारी उम्मीदें मेरी हर तरफ से टूट चुकी थी तब मुझे सिर्फ उस ऊपर वाले पे भरोशा था की चाहे जो हो जाये, पूरी दुनिआ मुँह फेर ले पर ऊपर वाला मुझे टूटने नहीं देगा पर इतना ही मुझे पता होता की वही मेरा दुश्मन है तो मैं क्यों उसके दर पे जाता। क्यों भीख मांगता उसके आगे, क्यों भिखारियों की तरह रोता रहा उसके आगे। उसने शिवरात्रि के तुरंत ही बाद मेरा सब कुछ छीन लिया, सारी उम्मीदें सारी मोहब्बत एक ही बार में तोड़ के रख दिया। मैं उसकी नज़र में एक बुरे इंसान से ज्यादा कुछ भी नहीं, जिसे पल भर की खुशियां नसीब नहीं होनी चाहिए। ऊपर वाला भी एक ही मकसद से अपने काम पे लगा हुआ है, की बस ये किसी भी कीमत पे खुश नहीं रहना चाइए। 
 
    उसे पता नहीं क्या सुझा जो अचानक उन्होंने अपना बड़ा दिल दिखाया कुछ ही पलों के लिए पर चलो मानते है दिखाया तो सही पर क्यों दिखाया जब फिर से तुम्हे छोड़ के चले जाना था। एक दिन उन्होंने अपने मन से मैसेज किया और कुछ पल की बातों के बाद हमेशा की दूरियां बना ली। उन्होंने ये नहीं माना की सामने वाला किस हालत से गुजर रहा है, आखिर क्या-क्या नहीं सहा होगा इतने टाइम में। उसे सिर्फ पैसो से प्यार है, जब तक उन्हें लगा मेरे पास पैसे है तब तक उन्होंने पूरा साथ दिया और अहसास होते है छोड़ के ऐसे चल दिए जैसे सदियों से एक-दूसरे के लिए अनजान ही थे। 
        
       कुछ वक़्त हाल पूछ के थोड़ी सी बात करके उन्होंने अहसास में मुझे अपना कहा। वो वक़्त मैं कैसे भूल सकता हूँ जिसे सुनने के लिए मैं सदियों का इन्तेज़ार कर रहा था। उन्होंने काफी सरलता से कह दिया अपना और मैं उन्हें सच में अपना मान बैठा और दिल फिर से हार बैठा पर एकदम से सब ठीक हो जाये ये भी कैसे हो सकता है। उन्होंने मेरे लिए अपने भगवन से दुआ मांगी थी की मैं सलामत रहूं। और कहना पड़ेगा की उनकी दुआएं में असर बोहोत है। मैं रोज-रोज पल भर मरता हूँ, हर दिन अपनी ज़िन्दगी को आखिरी साँस के साथ जी रहा हूँ।

    मेरा भरोशा टुटा है। कैसे मैं किसी को अपना कह सकता हूँ। बस यही मेरे आखिरी शब्द थे जो मैसेज में उन्हें मैंने कहा। ये बात वो अच्छे से जानती थी इस लिए पलट के उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। आज तक मैं इंतज़ार कर रहा हूँ की शायद अब वो कोई बात करें या कुछ तो कहेंगी ही। उन्होंने तो मेरा मैसेज का बॉक्स ही डिलीट कर दिया तो मैं कैसे उम्मीदें लगाए बैठ सकता हूँ। 

    मैं सबके लिए ज़हर बन चूका हूँ, मर जाऊंगा फिर सब खुश रहेंगे। 

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