भूलना आसान होता है

    सबके लिए कितना इजी होता है न की इतना सब कुछ होने के बाद भी ऐसा लगता है जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं था। जिसके लिए दिन-रात सोचते है फिक्र करते है सब बेमायने है उनके लिए। 
    
    कभी-कभी मन करता है सब छोड़-छाड़ के कहीं दूर चले जाऊं। इन सब से दूर, इतना दूर की कभी उन्हें याद भी आये और देखने को तरसने लगे मरने लगे तो भी हम उन्हें कभी न दिखे न कभी महसूस हों। ऐसा करीब की रूह से जुड़ा भी रहूं उनके और दूर इतना की वो चाहे मिलना इतना की जान जाये उनकी और मैं कभी उनको नसीब न होऊं। दर्द उन्हें भी प्यार का और तड़प ऐसी की भूख-प्यास मर जाये। 
    
    कल जब पता चला की उनकी तबियत बोहोत ख़राब है, उल्टियां हो रही है तो मन मेरा भी बेचैन हुआ। हाल जानने को तरस से गए थे। जी चाहता था की देख लूँ मिल लूँ उनसे, उन्हें सीने से लगा लूँ और वो अपना सारा दर्द भूल जाये। पर ये हो भी कैसे सकता है हम तो उनके लिए एक ढेर कचरे से ज्यादा कुछ भी नहीं। मैसेज करने के बाद भी कोई जवाब नहीं आया बस कह दिया उन्होंने की "आराम है" और हमे लगा था शायद उनके लिए हम कहीं तो स्पेशल होंगे। हर बार हमने खुद को गलत साबित होते हुए देखा है, और खुद को रोज टूटते हुए देख रहा हूँ। 
    
    आखिर मैं किस तरह का बेशर्म हूँ की वो नहीं चाहती मुझे अपनी ज़िन्दगी में और मैं बेशर्मों की तरह रोज उसके पीछे-पीछे भागता हूँ बस एक उम्मीद से की एक दिन तो हमारा मिलन जरूर होगा और ये ग़लतफहमी मुझे रोज होती है। 

   पर अब नहीं, अब हमेशा के लिए मैं उनकी ज़िन्दगी से चला जाऊंगा। जो ये भगवान भी मेरा दुश्मन है तो वो भी सही अब उसे हम भी नहीं दिखेंगे। रोज उनके आँखों के सामने हम भी नहीं आएंगे। 

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