A Child - Amit

एक बच्चा 

    एक ख्वाब जो न सोने पे मज़बूर कर दे। कुछ ऐसे ख्वाब आते है जिन्हे हकीकत में देखना या जीना बोहोत मुश्किल लगता है।  

    कल रात मुझे एक सपना आया जिसने मुझे जागने पे मज़बूर कर दिया। एक बच्चा जो अपनी तलाश में था। 

    मैं अपनी गहरी नींद में सोया हुआ था। दिन भर का थकान और टेंशन से भरा दिमाग था। नींद तो वैसे भी बोहोत मुश्किल से ही आती है, पर ख़याल जब भी आता है तो सोने नहीं देता। किसी न किसी वजह से जाग ही जाता हूँ। 

    मैं किसी पार्टी में था और अपना खाने का प्लेट लिए टेबल की तरफ बढ़ रहा था। अच्छी पार्टी चल रही थी, काफी सरे लोग भी आये हुए थे। किसी अमीर घर की शानदार पार्टी में मैं शरीक हुआ था। वैसे मेरे लिए ये पार्टी काफी वीआईपी थी की इतनी अच्छी पार्टी में जाने का मौका मिला। काफी सारे लोगों से बात चीत हो रही थी, सब एक दूसरे के साथ घुले मिले हुए थे। 

    खाने का टाइम हुआ सब अपना-अपना प्लेट लिए खाने को जाने लगे। हम भी अपनी प्लेट लिए खाने के लिए चले, मैं अपने ग्रुप में था। हमने प्लेट में डिनर लिया और टेबल की तरफ बढ़ने लगे। सबने अपनी सीट ले ली। मैं अकेला बचा और साथ ही की एक चेयर पे एक बच्चा बैठा हुआ था। देखने से लग नहीं रहा था की वो इस पार्टी का है। कहीं बाहर से आया हुआ लग रहा था। मैंने नहीं सोचा न देखा की वो भी अपना खाना खा रहा है। मैंने थोड़ा हीन भावना के साथ उसको वहां से उठा के साइड में जाने को कहा। मेरे शब्द उस बच्चे के लिए बहुत कठोर थे। मैंने थोड़े गुस्से में उसे कहा था। 

    हमारी टेबल भी पूरी पार्टी से एक तरफ कोने में ही थी एकांत में। हमने वही जगह चुनी थी शांति से बैठ के डिनर करने के लिए। मेरे उसे हटाए जाने के बाद वो वहां से उठ के चुप चाप चला गया। मैं बैठ के अपना डिनर करने लगा। तभी मेरी नज़र उस बच्चे पे पड़ी जो अपने हाथ में खाने की प्लेट लिए यहाँ वहां जगह ढूंढ रहा था। थोड़ी सी जगह में खुद के हिसाब से जगह उसे नसीब नहीं हो रही थी। 

    कुछ बड़े टेबल पड़े थे जो उसके लिए काफी बड़े थे। जगह नहीं मिलने पे वो उसके सहारे बैठने की कोशिश करने लगा पर नहीं बैठ पाया। फिर दूसरी तरफ से भी कोशिश करने पे वो बैठ नहीं पाया। मुझे बहुत अफ़सोस हुआ की ये मुझसे क्या हो गया। एक बच्चे के मुँह से निवाला मेरी वजह से दूर हो गया। उसने खाया या नहीं या भूखा ही अपनी जगह तलाशने मैंने उसे भेज दिया। मेरे मन में उसे देखने की ललक उठी। मैं उसका चेहरा देखना चाहता था। उसने लाल रंग की टी शर्ट और पेन्ट पहन रखा था। मैं चाह के भी उसका चेहरा न देख सका न उसके पास जा सका। वो भूखा बच्चा एक कोने में जा बैठा और वहां अपना खाना खाने लगा। उसका मुँह दूसरी तरफ था पर उसे देख ऐसा लगा जैसे मैंने सब देख लिया। 

    मैं उसके करीब जाने लगा ताकि उसे फिर उठा के अपने पास बैठा सकू पर उसी वक़्त मेरी नींद टूट गयी। नींद टूटने की वजह भी यही सपना था। 

    उठने के तुरंत बाद मेरी आँखों में आंसू थे। दिल भर आया था। मैं खुद को माफ़ नहीं कर पा रहा था। वो बच्चा मेरे जहन में बस गया था। आखिर मैं कैसे ये कर सकता था। वो एक बच्चा था, उसे प्यार से बैठा के खिलता या दूसरी सीट देता , मैं ऐसा तो नहीं था कभी। सपनों में ही आंसू आ गए थे और उठते ही मैं तारे देखने लगा और आँखों से आंसू छलक गए और मन में विचार आया की वो आसमान भी तो सबका है पर हमने अपने-अपने हिसाब से उसे बाँट दिया। वो क्या जाने की जमीन पे उसका भी बंटवारा हो गया है। 

    मैंने अपने आंसू पोछे जल्दी ताकि अचानक से उठा हुआ देख और आँखों में आंसू देख मम्मी कुछ पूछ न ले। किस्मत अच्छी थी की वो नहीं उठीं। मैंने अपने फ़ोन में टाइम देखा तो रात के 3 बज रहे थे और मैं सोया भी कुछ आधे घंटे पहले ही था। आधे घंटे के इस सपने ने मुझे बोहोत कुछ सीखा दिया। एक पल में मुझे दुनिया दिखा दिया। 

    जागने के बाद कई कोशिशों के बाद भी मैं सो नहीं पा रहा था। वो बच्चा मेरे दिल में घर कर गया। जब भी आंखे बंद कर सोने की कोशिश करता वो मेरी आँखों के सामने आ जाता। 

    जैसे वो ख़ामोशी में अपनी सारी बातें कह गया मुझे और मैं बोल के भी कुछ न बोल सका उसके आगे। सारी रात तो सो नहीं सका और सुबह का इन्तेज़ार करने लगा। सारी रात मैंने तारे देख के गुज़ार दिए। उन तारों में भी मैं किसी की तलाश किसी की याद में था। 

    अगला दिन हुआ और सब नार्मल दिन की तरह मैं अपना काम करने लगा और ऑफिस को चल दिया। रोज की तरह मेरा चेहरा नहीं था, उदास सा और खोया सा था। ऐसा तो रोज किसी की याद में रहता है पर आज वजह कुछ और थी। दिन भर वही बच्चा मेरे मन में चलता रहा। वो ख़ामोशी से सारा दिन अपनी यादें देता रहा। मैं चाह के भी उसे भूल नहीं पा रहा था। 

    हर बात मेरे दिल पे ही रह जाती है। कोई दोस्त नहीं जिससे बात कर सकूँ या मिल के मन बहला सकूँ। एक बंद कमरे में कैद सा हो गया हूँ। ऑफिस के बाद मैं राहुल जी के पास चला गया। अकेला रहने से अच्छा था की मैं कुछ देर उनके साथ टाइम बिता लूँ और मन हल्का हो जाये। मैं राहुल जी के घर पहुंचा और उनके साथ बैठ युहीं कुछ बातें करने लगा। वो पॉजिटिव माइंड के साथ बातें कर रहे थे पर मेरा चेहरा यूँहीं उदास ही था। वो कुछ पुरानी बातें कर रहे थे। जैसे राजा महाराजा की और महाभारत के युद्ध की। हम कई बार इन टॉपिक्स पे  बात करते है क्योकिं मुझे अच्छा लगता है उनसे इस तरह कहानियां सुनना। युहीं बातों-बातों में मुझसे न रहा गया और मैंने अपने सपने के बारे में उन्हें बताया। 

    सारी कहानी मैंने विस्तार से और आराम से सुनाया। वो बच्चा मुझे कुछ सीखा के गया जैसे या वो मेरे दिल में अपनी जगह बना ले गया। राहुल जी ने बोहोत धीरज के साथ सुना और समझने की कोशिश की और मेरे अतीत को देखा। हाल फ़िलहाल जिस कंडीशन में मैं अपनी ज़िन्दगी जी रहा हूँ वो सब उन्होंने ऑब्ज़र्व किया। 

    पूरी कहानी सुनने के बाद उन्होंने मेरा जैसे आंकलन किया और मेरे मन के भीतर लगे घाव को देखा। पूरी बातें सब इमोशनल कनेक्शन ही था। जो किसी न किसी के साथ अटैच्ड है जिससे मैं उभर नहीं पा रहा या दिल पे घाव लगा है। ऐसा इस लिए भी है की मैंने छोटी उम्र में अपने पिता को खो दिया जब तक मैंने अपनी पढाई तक पूरी नहीं किया था। कच्ची उम्र में घर की जिम्मेदारी ने ख्वाहिशें छीन ली। 

    राहुल जी ने कहा "आपके मन में कोई गहरा घाव है या दर्द है। ये खुद से किसी के दूर होने से है जिसे आप सबसे ज्यादा चाहते हो। जिसे आप अपने अंदर से छुपा के रख रहे हो। मुझे भी कुछ ऐसा ही महसूस होता था जब मैंने अपनी माँ को खोया था। भगवन से शिकायत करता था की भगवन मैं ही क्यूँ मेरे साथ ही ऐसा क्यों। बचपन में ही माँ का प्यार छीन लिया। प्यार की कमी हमेशा खलती थी। दूसरों को देखता मैं यही सोचता की मेरी माँ क्यूँ नहीं हैं, भगवान ने क्यूँ मेरी माँ मुझसे छीन ली। और आपके अंदर भी कुछ ऐसा ही घाव है जो आपको सोने नहीं दे रहा। किसी को खोने की वजह से ये हो रह है। " मैं फिर से खामोश था और मेरे पास कोई जवाब नहीं था। 

    मैंने अपनी ज़िन्दगी में दो लोगों को खोया है जिससे मैं अपनी जान से ज्यादा प्यार करता हूँ। पिता का जाना मेरे लिए ज़िन्दगी का सबसे बड़ा दुःख है। सब कुछ खो के भी जो मैं अब नहीं पा सकता। वो कमी अब कभी पूरी नहीं हो सकती। चाह के भी अब मैं खुद के लिए नहीं जी सकता। घर की जिम्मेदारियों में बंध के खुद की ख्वाहिशें मारना पड़ा हैं। दूसरा जो मेरा प्यार है। जिसे मैं हदों से ज्यादा चाहता हूँ। जिसपे दुनिया हार जाऊं मैं। जिसके प्यार के लिए मेरी कोई हद नहीं है इस दुनिया में। मुझसे उनका दूर होना जैसे मुझे मेरे ही अंदर मार देना है।  

    मैं कुछ कहने की हालत में नहीं था। मैं इसे गलत भी नहीं कह सकता था और उनसे कुछ कह भी नहीं सकता था। दिल के राज की बात कहने की हालत में नहीं था और शायद मैं कभी कह भी नहीं सकता। 

    वो बच्चा दूसरी तरफ नहीं था। उसका चेहरा मेरी तरफ ही था। बस फर्क ये था की मैं खुद को अपने ही सपने में देख रहा था। वो सपना मुझे अपना ही आईना दिखा रहा था। पर मैं चाह के भी अब कुछ कर नहीं सकता। ये सपने अब रोज आने लगे हैं। कोई ऐसी रात अब नहीं जिसे तारे देख के न काटूं। अब वो बच्चा अधूरे ख्वाब में मुझे छोड़ के गया है। चाहूँ तो भी वो सपना देख मैं उसे पूरा नहीं कर सकता। 

   

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